पटमा के दृष्टिबाधित राजेश सिंह बोकारो के मए डीसी... 4 साल की जंग के बाद मिली थी IAS मे़ पोस्टिंग

राजेश सिंह ने 4साल की जंग लड़ी थी.. सुप्रीम कोर्ट ने यूपीएससी को दिया था निर्देश... 2007 के IAS हैं राजेश आप भी जानें इस खास शख्सियत को, सुप्रीम कोर्ट ने इनके लिए कहा- दृष्टि नहीं, दृष्टिकोण जरूरी, देखेगा जमाना

पटमा के दृष्टिबाधित राजेश सिंह बोकारो के मए डीसी... 4 साल की जंग के बाद मिली थी  IAS मे़ पोस्टिंग
जीवन की गाड़ी दृष्टि से नहीं बल्कि दृष्टिकोण से चलती है। ऐसा कहना है राजेश सिंह का। राजेश दृष्टिबाधित आईएएस अधिकारी हैं। आंखों से दिव्यांग इस आइएएस अधिकारी राजेश सिंह को राज्य की हेमंत सोरेन सरकार ने बोकारो का डीसी नियुक्त किया है। राजेश सिंह राज्य में जिलाधिकारी का पद संभालने वाले आंखों से पहले दिव्यांग आइएएस अधिकारी होंगे। राजेश इस समय उच्च शिक्षा में विशेष निदेशक के पद पर तैनात हैं।आप भी जानें इस खास शख्सियत को, सुप्रीम कोर्ट ने इनके लिए कहा- दृष्टि नहीं, दृष्टिकोण जरूरी, देखेगा जमाना

 
पटना के धनरुआ के रहने वाले राजेश सिंह के साथ बचपन में ही ऐसा हादसा हुआ कि उनके आंखों की रौशनी चली गई। क्रिकेट खेलने के दौरान चोट लगी और उनके आंखों से कुछ दिखाई नहीं देने लगा। वे एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं। उनके पिता पटना कोर्ट में काम करते थे और माता गृहिणी हैं। इसके बावजूद उन्होंने जीवन में हार नहीं मानी और देहरादून के माॅडल स्कूल, दिल्ली विश्वविद्यालय व जेएनयू से पढाई की। उन्होंने यूपीएससी प्रतियोगिता पास की और आइएएस के लिए चयनित हुए। हालांकि उनकी अड़चनें परीक्षा पास कर जाने भर से खत्म नहीं होनी थी। सरकार ने आंखों में दृष्टि नहीं होने के आधार पर उनकी नियुक्ति का विरोध किया।

सेंट स्टीफेंस काॅलेज में पढाने वाली डाॅ उपेंद्र सिंह ने उन्हें अपने पिता तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलवाया। इसके बाद यह मामला अदालत गया और सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए राजेश सिंह की नियुक्ति करने का निर्देेश दिया और कहा कि आइएएस के लिए दृष्टि नहीं दृष्टिकोण की जरूरत होती है। उन्होंने 2007 में आइएएस की परीक्षा पास की लेकिन नियुक्ति 2011 में हो पायी। उन्होंने कोर्ट में अपने लिए कानूनी लड़ाई इस आधार पर लड़ी कि अगर हमें आइएएस में नहीं लेना है तो हमें यूपीएससी की परीक्षा देने नहीं देना चाहिए था।सुप्रीम कोर्ट में उनके मामले की सुनवाई तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर व अभिजीत पटनायक की बेंच ने की थी। उन्हें पहले असम में पोस्टिंग मिली और भाषाई दिक्कतों के आधार पर उन्होंने ट्रांसफर मांगा जिसके बाद उन्हें झारखंड कैडर दे दिया गया।

1998, 2002 और 2006 में आयोजित विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में दृष्टिबाधित भारतीय क्रिकेट टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके देश के पहले दृष्टिबाधित आईएएस अफसर राजेश सिंह पर भारत सरकार लघु फिल्म बनाई गई थी।सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फिल्म डिवीजन ने झारखंड में शूट की थी जो 2007 बैच के आईएएस अफसर के अबतक के संघर्ष की कहानी पर केंद्रित होगी।इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास और तत्कालीन मुख्य सचिव राजबाला वर्मा फिल्म में दृष्टिबाधितों को संदेश देते नजर आये। दिव्यांगों के हौसले को नई उड़ान देने के उद्देश्य से तैयार होने वाली यह फिल्म देश के विभिन्न थियेटरों तथा विशेषकर दूरदर्शन पर प्रसारित की गई जब फिल्म शूट की गई थी तब राजेश झारखंड में महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग में संयुक्त सचिव पद पर तैनात थे।

राजेश ने लगभग आठ महीने की कड़ी मेहनत से अपने संघर्ष की कहानी ‘पुटिंग द आई इन आईएएस’ नामक पुस्तक में लिखी थी, जिसका विमोचन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने किया था। राजेश के जीवन संघर्ष की बात करें तो बचपन से ही क्रिकेट में उनकी दिलचस्पी रही है। जब वे छह साल के थे, क्रिकेट बॉल को कैच करने के दौरान कुएं में गिर पड़े और सदा के लिए अपनी रोशनी खो दी। बकौल राजेश रोशनी खोने का गम जरूर है, लेकिन दृष्टि से अधिक महत्व दृष्टिकोण का होता है और इसी के बूते उन्होंने यहां तक की यात्रा तय की है।देहरादून मॉडल स्कूल से 12वीं तक की शिक्षा ग्रहण करने वाले राजेश ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में पीजी की परीक्षा पास की और तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा के लिए चयनित हुए। परंतु व्यवस्था आंखों से निशक्त राजेश को आइएएस बनाने के पक्ष में रोड़ा बनकर खड़ी हो गई। राजेश ने यहां भी हार नहीं मानी और सुप्रीम कोर्ट में यूपीएससी को चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके पक्ष में आया और 2011 में उन्हें आईएएस की ट्रेनिंग के लिए भेजा गया।उन्होंने बताया कि बचपन में क्रिकेट खेलते हुए एक हादसे में उनकी आँखों की रोशनी चली गई. इसके बावजूद उन्होंने देहरादून मॉडल स्कूल, दिल्ली यूनिवर्सिटी और जेएनयू से पढ़ाई की. फिर यूपीएससी की परीक्षा पास कर आईएएस बने।

राजेश सिंह के संघर्ष में दीपक कुमार का बड़ा योगदान है. दीपक उनके सहायक हैं और कॉलेज के दिनों के दोस्त भी. दीपक ने बताया कि राजेश सिंह की दिनचर्या आमलोगों की तरह है. वे वैसा हर काम कर सकते हैं, जिसकी किसी सामान्य इंसान से अपेक्षा की जाती है.

 
कृष्ण गोपाल तिवारी बने थे पहले नेत्र दिव्यांग कलेक्टर, प्रांजल पाटिल बनीं थी सब कलेक्टरराजेश सिंह से पहले मध्यप्रदेश में 2008 बैच के आइएएस अधिकारी कृष्ण गोपाल तिवारी पहले जिला कलेक्टर बने थे। 2014 में इस रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी।

राजेश सिंह देश के पहले दृष्टिबाधित आइएएस अधिकारी हैं। राजेश व कृष्ण गोपाल के बाद 2012 बैच के आइएएस अधिकारी अजीत कुमार यादव, 2013 बैच के आइएएस अधिकारी अमन कुमार गुप्ता व 2017 बैच की आइएएस अधिकारी प्रांजल पाटिल का नाम नेत्र दिव्यांग आइएएस अधिकारियों में शामिल है।राजेश सिंह से पहले पिछले ही साल 2017 बैच की नेत्र दिव्यांग आइएएस अधिकारी प्रांजल पाटिल केरल के तिरूवनंतपुरम में सब कलेक्टर बनायी गईं थी। महाराष्ट्र के उल्हासनगर की नगर रहने वाली प्रांजल ने भी छह साल की उम्र में अपनी आंखों की रौशनी खो दी थी। वे सब कलेक्टर बनने वाली पहली महिला नेत्र दिव्यांग अधिकारी थीं। उन्होंने तब कहा था कि हम कभी हार नहीं मान सकते हैं और न ही पीछे हट सकते हैं, हम अपनी पूरी क्षमता उस लक्ष्य को पाने में लगाएंगे जो हम चाहते हैं।